जनता के वोट से जीत, फिर पार्टी बदलने की होड़ , आखिर भोली-भाली जनता को कब मिलेगा उसका हक
नेताओं की राजनीतिक बाजीगरी लोकतंत्र नहीं, जनता का विश्वास कमजोर होता है - नरेश शर्मा
देखा जाए तो हर प्रदेश से लेकर सेंट्रल तक नेताओं की दल-बदल होते रहते है अभी फिलहाल देखा जाए तो मुकेरियां नगर कौंसिल के चुनाव जीतने के बाद कुछ निवार्चित एमसी द्वारा दूसरी राजनीतिक पार्टियों में शामिल होने की चर्चाएं ने आम जनता के बीच कई सवाल खड़े कर दिए हैं भारतीय मानवाधिकार महासंघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नरेश शर्मा ने कहा कि चुनाव के समय नेता जनता से बड़े-बड़े वादे करते हैं लेकिन जीत के बाद यदि जनप्रतिनिधियों अपना राजनीतिक ठिकाना बदल लेते हैं तो सबसे बड़ा सवाल उस जनता के विश्वास पर उठता है जिसने उन्हें अपना कीमती वोट देकर विजयी बनाया उन्होंने कहा कि जनता ने किसी व्यक्ति के साथ-साथ उसके चुनावी वादों और राजनीतिक विचारों पर भी भरोसा जताया था यदि जीतने के कुछ समय बाद ही जनप्रतिनिधि दूसरी पार्टी का दामन थाम लेते हैं तो यह नैतिक रूप से गंभीर बहस का विषय बन जाता है लोकतंत्र की असली ताकत जनता का विश्वास है और इस विश्वास को हर हाल मे बनाएं रखना जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है नरेश शर्मा ने कहा कि आज आम नागरिक महंगाई, बेरोजगारी, टूटी सड़कें, सफाई व्यवस्था, पेयजल, स्वास्थ्य सेवाएं और अन्य बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है जनता यह जानना चाहतीं हैं कि पार्टी बदलने से नेताओं को तो राजनीतिक लाभ मिल सकता है लेकिन आम लोगों को क्या फायदा होगा क्या उनके वार्डों का विकास तेज़ होगा क्या उनकी समस्याओं का समाधान होगा या फिर यह सब केवल सत्ता की राजनीति तक ही सीमित रह जाएगा भारतीय मानवाधिकार महासंघ के पदाधिकारियों और सदस्यों ने कहा कि जनता ने जनप्रतिनिधियों को राजनीतिक जोड़-तोड़ के लिए नहीं बल्कि विकास, पारदर्शिता और जनसेवा के लिए चुना है लोकतंत्र में जनादेश का सामान सर्वोपरि होना चाहिए और हर जनप्रतिनिधि को जनता के विश्वास पर खरा उतरना चाहिए भारतीय मानवाधिकार महासंघ के पदाधिकारियों और सदस्यों ने सभी निवार्चित जनप्रतिनिधियों से अपील की कि दल-बदल की राजनीति से ऊपर उठकर नगर और क्षेत्र के विकास को प्राथमिकता दें जनता अब केवल वादें नहीं बल्कि काम की जवाबदेही चाहतीं हैं आने वाले समय में मतदाता भी अपने जनप्रतिनिधियों के हर फैसले का लोकतांत्रिक तरीके से मुल्याकन करेंगे

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